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तीन बच्चों की माँ और भारत की शान महिला मुक्केबाज़ मैरीकॉम को सलाम।


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नमस्कार दोस्तों,

भारत की सबसे दिग्गज महिला मुक्केबाज़ मैरीकॉम ने  बोक्सिंग वर्ल्ड चैंपियनशिप के फाइनल में आठ साल बाद फिर अपनी जगह बना ली है।  दिल्ली में आयोजित इस वर्ल्ड चैंपियनशिप में पूरी दुनिया की निगाहें  भारत की सर्वश्रेष्ठ महिला मुक्केबाज़ मेरी कॉम पर टिकी हुई है। उम्मीद लगाया जा रहा है की शनिवार को होने वाले मुकाबले में गोल्ड जीतकर एकबार फिर भारत का नाम रौशन करेंगी. 48 किलोग्राम वर्ग के सेमीफइनल में उनका मुकाबला उत्तर कोरिया की कीम ह्यांग मी के साथ था। उन्होंने  बहुत ही कॉन्फिडेंस के साथ इस मुकाबले को खेला और जीत हासिल करके यह साबित  कर दिया की उन्हें मैग्निफिशेंट मैरी के नाम से यूँ ही नहीं बुलाया जाता।

अगर इस बार फिर मैरी कॉम इस वर्ल्ड चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर लाती हैं तो यह उनका लगातार छठा स्वर्ण पदक होगा. 

एक निम्न आर्थिक स्थिति वाले मज़दूर परिवार में जन्मी मैरी कॉम के लिए उनकी कामयाबी तक का यह सफर आसान नहीं था. उन्होंने पग पग पर कड़ी चुनौतियों और हौसले को तोड़ देने वाली बड़ी बाधाओं  का डट कर सामना किया है। मेरी कॉम ने अपने  कामयाबी के रास्ते में आने वाली हर बाधा को लांघकर यह  साबित कर दिया की वो विलपॉवर  की एक बहोत बड़ी मिसाल हैं। यही वजह है की उन्हें आज पूरी दुनिया आयरन लेडी के नाम से जानती है. Image result for mairy com


हर जगह खुद को विजेता साबित किया

जब वो मुक्वेबाजी में आईं थीं तो इस खेल का कोई बड़ा भविष्य नहीं था और जोखिम का कोई  हिसाब नहीं था. घरवालों ने मना किया. खेल राजनीति ने रास्ता रोका. गरीबी और अभावों ने भी काफी मुश्किलें पैदा की -लेकिन क्या मजाल की मैरी कॉम का विश्वास डगमगा जाए . हर जगह उन्होंने खुद को विजेता साबित किया-चाहे ओलंपिक हो या एशियाई खेल या फिर विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप। 

बचपन मिट्टी की झोंपड़ी और मजदूरी में बीता

मैरी कॉम के अभिभावकों के पास एक मिट्टी की झोंपड़ी थी. उन्हें भी अपने बचपन में खेतों में मजदूर के तौर पर काम करना पड़ा. ये वो समय था जब उनके पास सपनों की उडाऩ के लिए पंख भले ही न रहे हों लेकिन उनके इरादे जरूर मजबूत थे. बचपन की कड़ी मेहनत ने उन्हें एक मजबूतपहचान दी. और बचपन के उसी मेहनत और मजबूत आत्मविश्वास के बदौलत अब उनकी जिंदगी पूरी तरह से बदल चुकी है.

मेरी कोम के पास सबकुछ है, आज भले ही उनकी परिस्थितियां बदल चुकी हैं लेकिन वो नहीं बदलीं हैं. जब भी घर में होती हैं तो खुद अपने पूरे घर को धोती हैं, सफाई करती हैं, खाना बनाती हैं, वह अपने तीन बेटों की प्यारी मम्मी बन जाती हैं।  मैरी कॉम अपने खाली समय में वो सारा काम करती हैं जो की एक आम घरेलु महिला करती हैं। 

फीस नहीं होती थी स्कूल की

कई बार ऐसा होता था जब मैरी कॉम के पिता उनकी स्कूल की फीस भी जमा नहीं कर पाते थे जिस वजह से  उन्हें क्लास के बाहर खड़ा कर दिया जाता था। मेरी ने अपनी आत्मकथा अनब्रेकेबल में लिखा है, गांव में शायद सभी बच्चे उतनी मेहनत नहीं करते थे, जितनी हम लोग. मैं खेतों में पिता के साथ काम में मदद करती रहती थी. और अपने साथियों को दुूर से खेलते हुए देखती थी. अक्सर मुझे बैलों को लेकर खेत में बुआई का काम करना पड़ता था। ये बहुत मुश्किल होता था क्योंकि बैलों को भी नियंत्रित करते हुए चलाना होता था और साथ साथ बुआई भी करनी होती थी। 
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जाड़े में कपड़े नहीं होते थे

खेतों में काम करने के साथ मेरी गायों को चरातीं, दूध दूहतीं. कभी मायूस भी होतीं कि वह बच्चों के साथ खेल क्यों नहीं पा रहीं।  मेरी के परिवार के दिन तब इतने कठिन थे कि कई बार तो कोई उम्मीद की किरण ही नजर नहीं आती थी।  लगता था कि ये अंतहीन सिलसिला कब तक चलता रहेगा।  पढाई लैंप की रोशनी में होती थी। पहनने के लिए नाममात्र के कपड़े होते थे।  जाड़े हमेशा उनके कठिन होते थे, जो रातों में सोने के दौरान उन्हें कंपकंपाते रहते थे। 

पहली बार कब पदक जीता

गांव के पास के कस्बे में जब उन्होंने स्कूल की पढाई पूरी कर ली तो वह आगे की पढाई के लिए इंफाल गईं. यहीं उन्होंने पहली बार सही तरीके से बॉक्सिंग सीखना शुरू किया. वह स्कूल जातीं, लेकिन साथ में सुबह भारतीय खेल प्राधिकरण की बॉक्सिंग एकेडमी जातीं, प्रैक्टिस करतीं और लौटकर खाना बनातीं थीं. 

उनको देखकर लोगों को लगता था कि उनकी जैसी एक दुबली पतली लड़की बॉक्सर कैसे बन सकती है।  पहली बार उन्हें एक राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में 48 किलोवर्ग में हिस्सा लेने का मौका मिला।  जब वह रिंग में उतरीं तो उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी खिलाडियों को बुरी तरह हराया। 

उनके मुक्कों में इतना दम था कि कोई भी उनके सामने टिक नहीं पाया।  उन्होंने न केवल गोल्ड जीता बल्कि वह प्रतियोगिता की श्रेष्ठ बाक्सर भी चुनी गईं।  वर्ष 2001 में पहली नेशनल वूमन बॉक्सिंग चैंपियनशिप चेन्नई में आयोजित की गई थी।  मेरी का चयन मणिपुर की टीम में 48 किलोवर्ग टीम में हुआ।  अभ्यास शिविर बेंगलूर में था।  ट्रेन में रिजर्वेशन मिला नहीं, लिहाजा टीम को ट्रेन के डिब्बे में टायलेट के पास बैठकर जाना पड़ा।  चेन्नई में भी मेरी ने गोल्ड मेडल जीता। 

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